श्री कृष्ण की मौत के बाद क्यों डूब गयी द्वारका नगरी ? When Why And How Dwarka Sank?

कब क्यों और कैसे डूबी द्वारका ?दोस्तों गुजरात के तट पर समुन्द्र के गर्त में  एक पुरा नगर जलमग्न है दोस्तों कहा जाता है की ये वही द्वारिकनगरी है जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम के साथ बसाई थी लेकिन महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पछतात ये नगरी समुन्द्र में समा  गयी और अंततः सभी यदुवशी मारे जाते है किन्तु सवाल ये उठता है इतनी बड़ी और स्वयं भगवान  विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण की नगरी डूब कैसे गयी पौराणिक कथाओ में द्वारिका नगरी के डूबने की दो प्रमुख कथाये है तो आइये जानते है की द्वारिका नगरी कैसे डूबी

प्रथम कथा 

सबसे पहले महाभारत की कथा से शुरू करे तो दोस्तों ये तो सबको पता है की महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण ही  पाण्डो की जीत के सूत्रधार थे उन्होंने बिना अस्त्र शस्त्र उठाये ही कौरवो की सेना को धूल छटा दी थी युद्ध के पश्ताप जब माता गांधारी ने अपने 100 पुत्रो की शव देखें तो वो विचलित हो गयी और उनके  पास ही विलाप करने लगी, भगवन श्री कृष्णा गांधारी का बहुत सम्मान करते थे और उनको विचलित देख के वो शोक वयक्त करने के उद्देश्य  से उनके पास चले गए जब गांधारी ने उनको अपने समीप देखा तो उनके कोर्ध काफी बढ़ गया और उन्होनें  इसके के लिए सारा दोष भगवन श्री कृष्ण के सर पर मड दिया और उनसे कहा , कृष्ण  तुम चाहते तो युद्ध टल सकता था लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया और फिर उन्होनें गुस्से में कहा की मै  तुम्हें इस कार्य  के लिए कभी माफ़ नहीं करुँगी माता को क्रोधित देखके वो उनकी बातें को धैर्य  से सुनते रहे लेकिन गांधारी का कोर्ध बढ़ता गया  की उन्होनें श्री कृष्ण को श्राप दे दिया ,जिस तरह  मेरे वंश का नाश हुआ है ठीक उसी तरह तुम्हरे वंश भी आपस में लड़ते हुए नस्ट हो जायेगा ,इस भयानक  श्राप को भी सुनने के बाद श्री कृष्ण ने विनम्रता से  माँ से कहा ,माँ अगर आपको ये श्राप देकर आपके मन को शांति मिलती है तो ये भी मुझे स्वीकार है इतना कहते ही वो अपनी द्वारिका नगरी पहुंच गए

दोस्तों कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध को समाप्त हुए अभी 36  वर्ष ही बीते थे की गांधारी के  श्राप ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया उनके अभिशाप से ही द्वारिका में अपशुगन होना शरू हो गया इसी तरह एक दिन सबने एक ऐसा  मादक पदार्थ  भी पि लिया ,जिससे सबकी बुद्धि भ्रस्ट हो गयी और सभी आपस में लड़ने लग गए इस तरह द्वारिका नगरी में ग्रहयुद्ध छिड़ गया जिसमें भगवन श्री कृष्ण और कुछ लोगो को छोड़ के कोई भी जीवित नहीं बचे

दूसरी कथा 

इस प्रकार एक और कथा बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद जब 36 वा वर्ष शरू हुआ तब नगर में कुछ ऋषियों  का आगमन हुआ नगर में तरह तरह के अपशुगन होने लगे थे  तभी एक दिन महर्षि ऋषि, विश्वामित्र ,कडव ,देवऋषि नारद  द्वारिका गए यहाँ के यादव कुल के कुछ बालको ने उनके साथ मजाक करने की सोची ऋषियों का मजाक बनाने के लिए वो भगवान्  श्रीकृष्ण के  पुत्र साम को स्त्री बना के उनके पास ले गए और कहा की ये स्त्री गर्भवती है कृपया आप बताये की इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होता है  इसे ही कहते है विनाशकाले विपरीत बुद्धि  ऋषियों को समझ  आ गया की ये बालक हमारा मजाक बना रहे है इस प्रकार उन्होंने क्रोधित हो के पुरे युदोवंशी को श्राप दे दिया की ,श्री कृष्णा का ये पुत्र अंधक वंशी पुरषो  का नाश करने के लिए लोहे का मुसल  पैदा करेगा जिसके द्वारा क्रूर और तुम जैसे कोर्धित लोगो अपने समस्त कुल का संहार करोगे उस मुसल के प्रभाव से बस श्री कृष्णा और बलराम ही  बच पाएंगे और जब श्री कृष्णा को ये बात पता चली तो उन्होंने  कहा ये बात अवश्य ही सत्य होगी  है और यही हुआ दोस्तों ऋषियों  मुनि के श्राप के चलते ही अगले दिन एक साप ने एक मुसल उत्पन्न किया इस मुसल को देखते ही महाराजा अग्रसेन ने उस मुसल को समुन्द्र किनारे छुपा दिया और इसके बाद घोषणा की गयी की पूरी नगरी में कोई भी मदिरा नहीं पियेगा और इस घोषणा को सुनते ही द्वारिका वाशियो ने मदिरा नहीं बनाना का सोचा लेकिन तब तक देर हो गयी थी द्वारिका में अपशुगन की बरषि आ गयी थी कहा जाता है की दपुरे नगर  में इतने चूहे हो गए थे  की वो रात में सोये हुए मनुष्य के बाल और नाखून कुतर कर खा जाया करते थे सारस उल्लू और बकरे की आवाज निकालने लगे गायों के पेट से गधे और नेवले के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे उस टाइम यदुवंशी को पाप करते समय शर्म नहीं आती थी धीरे2  श्री कृष्ण को ये आभाष आना लगे की माँ  गांधारी के श्राप का सच होने का समय आ गया और कृष्ण पक्ष  के 13 दिन मुनि  अमावश्या में काल का दिन तय परतीत हुआ क्युकी ये दिन वैसा ही बन रहा था जैसे महाभारत के युद्ध के दिन था  इसी घटना को भांपते हुए श्री कृष्ण ने सबको तीर्थयात्रा करने को कहा सभी यात्री तीर्थ यात्रा करने के पछतात प्रभास तीर्थ में रहने लगे

कुछ दिन के बाद ही तट के पास अंधक वंशी वैष्णवंशी के बिच विवाद उत्पन्न हो गया और देखते देखते पूरा युदोवंश समाप्तः हो गया और श्री कृष्णा नगर यहाँ एक स्त्रियो को अर्जुन के भरोशे छोड़ के जगल चले गए यहाँ पर एक आर्कटक ने उनको हिरन समझ के उनपर तीर चला दिया तीर चलने के बाद जब वो अपना शिकार पकड़ने के लिए वहां पर पहुंचा तो भगवन श्री कृष्ण को देखे के उसे अपने भूल पर पछताप हुआ तब श्री कृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और अपने परम धाम चले गए

दूसरी तरह श्री कृष्ण के पिता वासुदेव  प्राण  त्याग दिए जिनका अंतिम संस्कार पांडव पुत्र अर्जुन ने किया वासुदेव की पत्नी देवकी भद्रा रोहिणी ,मदिरा भी चिता पर बैठ के सती  हो गयी इसके बाद उन्होनें सारे यदुवंशी का विधिवत अंतिम संस्कार किया अर्जुन ने सभी को इन्द्रप्रथ से ले जाने का निर्णय किया क्युकी उसको पता था अब समुन्द्र द्वारिका नगरी को डूबा देगा अपने आगमन के ७वे दिन अर्जुन सभी स्त्रियों को लेके इंदरप्रस्थ की और आगमन कर गए और अर्जुन के जाते ही द्वारिका नगरी समुन्द्र में समां गयी

तो दोस्तों ये थी वो कथा थी जिससे हमें पता चला की द्वारिका नगरी का डूबने का क्या रहस्य था आशा  करते है आपको जानकारी पसंद आयी होगी

अलविदा

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