प्रेमानन्द महाराज का जीवन परिचय Biography Of Premanand Maharaj

नमस्कार दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हम बात करने वाले है पूज्य गुरु जी प्रेमानंद महाराज के बारे में अधिकांश लोग को पता ही है महाराज जी को पीले वस्त्र पहने हुए एकांत में वृन्दावन में देखा जाता है महाराज जी की बहुत सारी वीडियो और रील सोशल मीडिया में वायरल हुई है महाराज जी की दोनों किडनिया 18 सालो से fail हो रखी है और अगर देखा जाये की किसी भी व्यक्ति की अगर  दोनों किडनिया fail हो जाये वो भी 18 सालो  से तो वो व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता है महाराज जी  की आभामंडल में जो तेज है जो उनकी वाणी में ओज है उन सब को देख के लगता है की जैसे साक्षात् श्री कृष्णा ही महाराज के मुँह से बोल रहे हो, तभी तो ये इतने अंतराल बाद भी दोनों किडनी के fail हो जाने के बाद भी दोनों किडनियों के बिना जीवित रह रहे  है महाराज जी ने अपनी दोनों किडनियों का नाम राधा और श्रीकृष्ण रखा है और उन्होनें ये नाम इसलिए रखा है क्यूकी श्री कृष्ण की कृपा से ही महाराज जी अभी तक जीवित है और अभी तक लोगो को आधियात्मिकता  की तरफ प्रेरित करते है और लोगो के जीवन से कष्ट समस्याओ को दूर करते है

महाराज प्रेमानंद का जनम उत्तरप्रदेश के  कानपुर जिले में आखिरी गांव सरसौल में हुआ था महाराज जी  का बचपन का नाम अनिरुद्ध पांडेय था उनके पिता जी  का नाम श्री शंभू पांडेय और माता जी का नाम श्रीमती रमा था महाराज जी  के दादा जी सन्यासी थे बुजर्गो के आशीर्वाद से उनके परिवार का वातावरण शुद्ध और भक्तिपूर्ण रहता था उनका पूरा परिवार संत  होने की वजह से उनके घर संतो का आना जाना लगा रहता था, संतो के आने जाने के कारन ही महाराज जी  को संतो के अधियात्मिक के प्रति रूचि बढ़ने लग गयी ,कक्षा 5 में आते ही महाराज जी ने सभी प्रकार की चालीसा का पाठ कांस्टष्ठ याद कर लेते थे  और वो रोज 10 से 15 प्रकार की चालीसा का पाठ करते थे और तिलक लगा कर स्कूल जाते थे तिलक लगा कर स्कूल जाने से कई बार महाराज जी का हसी मजाक भी उड़ाया जाता था

बचपन के दिनों में  प्रेमानंद महाराज  को एक विचित्र ख्याल आया की ,अगर माँ की मृत्यु हो जाएगी और पिता की भी मौत हो जाएगी तो इनका प्यार तो सदैव रहेगा ही नहीं हमारे घर के सदस्य तो हमारे साथ हमेशा रहेंगे नहीं तो इन सब विचार के आने के बाद उनको लगा की एक सिर्फ भगवान्  का प्यार ही  हमेशा उनके साथ रहेगा है इन विचारो के आते ही वो नवी कक्षा में आते ही अपनी अम्मा से बोले ,”वो अपनी अम्मा से बहुत प्यार करते थे ,”अम्मा हम साधु बन जाये सन्याश  के लिए हम घर छोड़ देंगे माँ को ऐसा लगा बच्चा अभी बचपन में आकर ऐसे बात कर रहा है कुछ दिन में जब  बड़ा हो जायेगा तो उस के मन से ये ख्याल निकल जायेगा,लेकिन  अगले दिन ३ बजे महाराज जी  के मन में व्याकुलता उठती है उन्होनें अपना जीवन भगवन के चरणों में समपर्ण कर दिया और 13  साल की उम्र में ही महाराज जी  ने घर छोड़ दिया कर वो अनंत यात्रा की तरफ प्रस्थान करने लगे और घर छोड़ने के बाद ही उन्होंने भ्रमचर्या की तरफ रुख किया और उनका नाम बदल कर आनंद सुरूप भ्रमचारी रखा गया, सन्यास स्वीकार करने के बाद  उनका नाम आनंद श्रम स्वामी रखा गया शुरुवात के दिनों में महाराज ने वाराणसी में तपस्या  की और वाराणसी  में वो तुलसी के पेड़ के निचे महाराज जी 3 बार गंगा स्नान करने के बाद ध्यान करते थे  और वही भिखारी  की लाइन में लग कर जो भी परशाद मिलता  खा लेते थे और अगर प्रसाद नहीं मिलता था तो सिर्फ गंगा जल पीकर अपना गुजरा करते थे  कई बार तो  ऐसा भी दिन आया  की महाराज जी को सिर्फ गंगा जल पीकर ही गुजारा करना पड़ा महाराज खुली छत में रहते थे और उनके  तन में ज्यादा कपडे भी नहीं होते थे , ठण्ड के समय भी महाराज जी  सामान दिनचर्या को ही फॉलो करते थे और  उनके पास ज्यादा कपडे भी नहीं होते थे और  भगवान की कृपा से उनको किसी भी प्रकार की कोई बीमारी नहीं होती थी और हमेशा वो अपना नित्य नियम पालन करते रहते थे

एक दिन पीपल के पेड़ के निचे ध्यान करते समय उनके मन में वृन्दावन  के प्रति आस्था  जागृत हुई महादेव के कृपा से ही अगले ही  दिन एक अपरिचित इंसान उनसे मिले और उन्होनें उनसे बनारस  में हो रही चैतन्य लीला और रासलीला के  मंचन को देखने के लिए उनको आमंत्रित किया उन्होंने उस अपरिचित व्यक्ति को २,3 बार मना भी किया पर ज्यादा हठ करने पर वो महादेव की कृपा  समझ कर उनके साथ चल दिए ,सुबह का समय था चैतन्य लीला हो रही थी महाराज जी ने  चैतन्य लीला देखने के बाद ,रासलीला भी देखि और अचानक वो उस रासलीला में इतना खो गए की वो इस रासलीला के मंचन को डेली 1  महीने तक देखने लग गए और ये मंचन  देखने के बाद ही महाराज जी के मन में वृन्दावन के प्रति और हमारे बाके बिहारी के प्रति इतनी आस्था जग गयी कि वो वहा जाने के लिए सोचने लगे की ,”कैसे भी करके मुझे वृन्दावन जाना है इसके बाद संकटमोचन मंदिर के पुजारी जी ने उनको  प्रसाद दिया और उनके सहयोग  से ही वो एक दिन मथुरा  के लिए ट्रैन पे बैठ गए फिर वो मथुरा पहुँच गए और उन्ही  के सहयोग से महाराज जी  वृंदावन पहुंच गए और वृन्दावन  पहुंच कर महाराज जी पप्रारभिक  दिनों में वृन्दावन  की परिकर्मा करते थे और फिर बिहारी जी के दर्शन करते थे फिर किसी दिन बिहारी जी मंदिर में ही किसी  संत ने उनसे  कहा क्यों नहीं आप एक बार श्री राधा बल्लभ मंदिर का भी दर्शन करे?

फिर महाराज जी राधा बल्लभ मंदिर पहुंचे और जैसे ही वो मंदिर पहुंचे वो उसे 1 घंटे तक निहारते ही रह गए और उनके आँखों से अश्रु निकलने लगे और वो प्रेम विभोर हो गए उनके प्रति उनके मन में असीम भक्ति जागृत हो गयी और उधर ही गोस्वामी महाराज ने उनको राधा सुधा निति का ही एक श्लोक भी सुनाया और फिर महाराज जी को उसका अर्थ बताते हुए श्री हरिवंश राय नाम जपने के लिए महाराज जी को प्रेरित किया, महाराज जी श्री हरिवंशराय जपने के लिए अपने आपको असहज महसूस  कर रहे  थे मगर वृन्दावन की परिकर्मा करने के दौरान ही अचानक उनके मुँह से हरिवंशराय का  नाम निकलने लगा और महाराज  जी हरिवंशराय जी के  कायल हो गए और इस तरह वो राधा बल्लभ जी की भक्ति में लीन  हो गए और इस तरह वो एक सन्यासी से राधा बल्लभ भक्त बन गए,, वर्तमान समय में प्रेमानंद महाराज जी वृन्दावन के आश्रम में रह रहे है और उनका नंबर सार्वजानिक नहीं किया गया है

महाराज जी का दर्शन करने के लिए आपको श्री हित राधा केलि कुंज वृन्दावन परिकर्मा  मार्ग पराघाट  वृंदावन  उत्तर प्रदेश वृन्दावन भवन में आप महाराज जी से मिल सकते है और समपर्क कर सकते है

आशा करते है आपको ये उपर्युत्त जानकारी अच्छी लगी होगी तो दोस्तों एक लाइक प्रेमानंद महाराज जी के लिए  जरूर करे.

 

 

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