धर्मग्रंधो के अनुसार गर्भवस्था के दौरान सम्बन्ध बनाना सही है या गलत।

गर्भावस्था में सहवास करना सही है या गलत ?दोस्तों भारतीय समाज में सेक्स या फिर सहवास के बारे में खुल के बात करना अजीब माना जाता है ,सेक्स के प्रती रूचि  में लोगो की कोई कमी नहीं है लेकिन जयादातर भारतीय इसपे  चर्चा करने से बचते है लेकिन कभी आपने सोचा है की अगर हिन्दू धर्म सहवास का विरोधी होता तो क्या  हिन्दू धर्म के मूल सिदांत धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष में काम को शामिल किया जाता, सोचिये क्या आचार्य वात्सायन काम सूत्र की रचना करते नहीं तो आज हम क्यों  सहवास यानि  सेक्स जैसे महत्पूर्ण विषय में बात करने से डरते है क्युकी हिन्दू शास्त्रों के अनुसार सहवास के मेति लाभ आचार्य सुख मानसिक सुख ,दीघार्यु शारीरिक और मानसिक सुख की प्राप्ति हासिल की जा सकती है

आज की युवा पीढ़ी बस एक दूसरे से आनंद के लिए सम्बन्ध स्थापित करते है जबकि उनको ये नहीं पता की पति पत्नी का साथ रहना रिश्तो को मजबूत बनाये रखने के आधार है बशर्ते उसमें प्यार हो काम वासना  नहीं इसलिए ये जरुरी हो जाता है की आज की युवा पीढ़ी को सहवास के प्राचीन नियम धर्म के बारे में पता होना बेहद जरुरी है ताकि उनका रिश्ता मजबूत हो सके और उनको एक संस्कारी संतान की प्राप्ति हो सके सहवास यानि सेक्स जिंदगी का बेहद हिस्सा है लेकिन कई लोगो के मन में ये सवाल उठ ता है की पार्टनर के गर्भवती पे शारीरिक सम्बन्ध बनाना सही है या गलत है

हिन्दू शास्त्रों में ये बताया गया की किसी भी पुरुष को अपनी गर्भवती पत्नी के साथ सहवास यानि सेक्स नहीं करना चाहिए यदि कोई गर्भकाल में संभोग करता तो भावी संतान के अपंग और रोग उत्त्पन्न होने का खतरा बन जाता है हालांकि किसी शास्त्रों  में गर्भावस्था के  के २ या ३ महीने के बाद सेक्स बनाने का उल्लेख  मिलता है लेकिन उचित यही है की गर्भ ठहरने के बाद सहवास नहीं किया जाये तो ज्यादा अच्छा है हिन्दू -धर्म शास्त्रों में सहवास के कई नियम बताये गए है

पहला नियम

दोस्तों हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार मनुष्यो के शरीर में व्यान ,समान अपान  उदान और प्राण प्रकार की 5 वायु रहती है इन 5 में से अपान वायु ही मल, मूत्र शुक्र गर्भ और आर्तव को बाहर निकालने का काम करती है इसमें से शुक्र को ही वीर्य कहा जाता है यानि ये वायु संभोग  से सम्बन्ध रखती है शास्त्रों  के अनुसार जब इस वायु की गति में फरक आता है या ये किसी भी प्रकार से दूषित हो जाती है तो मूत्राशय और गुदा सम्बंधित  रोग उत्पन्न होने लगते है जिस वजह से संभोग की शक्ति  पर भी असर पड़ता है

अपान वायु ही किसी स्त्री  में माहवारी प्रजनन और यहाँ तक संभोग को भी नियंत्रित करने का कार्य  करती है इसलिए मनुष्य को चाहिए  की वो अपने इस वायु को शुद्ध  और गतिशील बनाये रखने के लिए अपने उदर  यानि पीठ को साफ रखें और निश्चित समय पे शौच से निर्वात हो.

दूसरा नियम

कामसूत्र के रचियता आचार्य वात्सयान का मानना है की स्त्रियों  को काम शास्त्रों का ज्ञान होना बेहद जरुरी है क्युकी इस ज्ञान का प्रयोग परुषो के मुकाबले स्त्री  लिए अधिक जरुरी है वो लोग लिखते है की यदि स्त्रीऔर पुरुष में  दोनों में इसका भरपूर ज्ञान होगा तो चरम सुख की प्राप्ति होती है वात्सायन के अनुसार सभी स्त्री को विवाह से पहले अपने पिता के घर में और विवाह  के बाद अपने पति के अनुमति के अनुसार कामशास्त्र की शिक्षा लेना जरूर चाहिए इससे दांपत्य जीवन में स्थिरता बनी रहती है और पति अन्य महिला की और आकर्षित नहीं हो पाता  है इसलिए स्त्रियों को योन किर्या का ज्ञान होना अति आवश्यक है ताकि वो काम कला में निपूर्ण हो सके और पति को अपने प्रेम पाश  में बांध कर रख सके.

तीसरा नियम

मित्रो हिन्दू  शास्त्रों के अनुसार पति पत्नी को अमावस्या ,पूर्णिमा ,चतुर्थी ,अष्टमी ,रविवार संक्रांति संधिकाल श्राद्ध  पक्ष , नवरात्रे, श्रवण मॉस और ऋतुकाल आदि में किसी भी रूप  में संभोग स्थापित नहीं करने चाहिए  जो पति पत्नी इस धर्म का पालन करते है उनके घर में सुख समृद्धि शांति  और आपसी प्रेम आनंद बना रहता है और जो ऐसा नहीं करते है वो अपने घर में गृहकला ,धन की हानि और आकाशमीक घटनाओ को आमंत्रित करने का काम  करते है

चौथा नियम

हमारे धर्म शास्त्रों में ये भी बता गया है की रात्रि  का पहला पहर  यानि की 12  बजे तक प्रतिकिया  के लिए सबसे उचित समय है इस समय की गयी रतिकाला के फल स्वरुप धार्मिक ,सात्विक अनुशासित  संस्कार वान  माता पिता से प्रेम रखने वाली, धर्म का कार्य  करने वाली यशश्वी  माँ के समान संस्कारी संतान की प्राप्ति होती है और भगवान के आशीर्वाद से  ऐसे सन्तानो की आयु लम्बी और दीर्घवान होती है और जो स्त्री पुरुष रीती काल के बाद संबंध बनाते  है उनकी होने वाली सन्तानो में राक्षस के समान गुण आने की प्रबल आशंका होती है क्युक प्रथम पहर के बाद राक्षक गढ़ पृथिवी लोक के भमण पे निकलते है इसके अलावा पहले पहर के बाद प्रतिकिर्या इसलिए भी अशुभकारी है क्युकी ऐसा करने से शरीर को कई रोग भी घेर लेते है.

पांचवा  नियम

हिन्दू प्राचीन ग्रन्ध आयुर्वेद  के अनुसार किसी भी पुरुष को  स्त्री के  मासिक  धर्म के दौरान अथवा किसी रोग सक्रमण होने पर उसके साथ सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए यदि वो खुद को सक्रमण जीवाणु से बचाना चाहता है तो सहवास के पहले और बाद में उसे कुछ स्वछता का ध्यान रखना चाहिए ,जननांगो पे  पे किसी भी प्रकार का घाव  या  दाना हो  तो सहवास न करे, सहवास के बाद जननांगो को अच्छे से साफ़ करे या स्नान कर ले।

छठा नियम 

यदि पति पत्नी की सहवास करने की इच्छा नहीं है या मन उदास और खिन्न है इस स्थिति में भी सहवास नहीं करना चाहिए या इसके अलावा घर में या मन में किसी भी प्रकार का शोक  है तो भी सहवास नहीं करना चाहिए अर्थार्थ पति पत्नी की मनोस्थिति अच्छी है तभी सहवास करना चाहिए

सातवां नियम 

इन सबके आलावा हिन्दू धर्म शास्त्रों में  ये भी बताया गया है की पवित्र माने जाने वाले वृक्षो के नीचे के निचे, सार्वजनिक स्थानो, चौराहो ,उद्यान ,श्मशान घाट औषद्यालय ,मंदिर,ब्राह्मण गुरु और अध्यापक  के निवास स्थान में संभोग नहीं  करना चाहिए यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो शास्त्र अनुसार उसको इसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ता   है

आठवाँ  नियम 

हिन्दू धर्म शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है की  किसी भी स्त्री और पुरुष को किसके सहवास नहीं करना चाहिए ,दुष्चरित अस्थव्यवहार करने वाली तथा अकुलीन परपुरुष के साथ सहवास नहीं करना चाहिए  अर्थात व्यक्ति को अपनी पत्नी के साथ ही सहवास  करना चाहिए नियम विरुद्ध जो  ऐसा काम करता है वो बाद में  जीवन के हर मोड़ पे पछताता क्युकी उसके अनैतिक कीर्तय  को देखने वाला ऊपर बैठा है

तो दोस्तो आशा करते है आपको उपर्युत्त जानकारी अच्छी लगी होगी। एक लाइक करके जरूर जाये

अलविदा।

 

 

 

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