उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है ?हरेला का पर्व का इतिहास ?क्या है हरेला ?

दोस्तों timesofgloble .com  में आपका एक बार फिर से स्वागत है दोस्तों सर्वप्रथ आपको उत्तराखंड के प्रसिद्व  त्यौहार हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ,जो लोग उत्तराखंड से है  उनलोगो को तो इस पर्व के बारे में सब पता होगा सहायद ही कोई होगा जो नहीं जानता  होगा और जो उत्तराखंड के आलावा अन्य देशो से है उनके लिए आज हम आपको बताएँगे की हरेला पर्व क्या होता है हरेला क्यों मनाया जाता है और हरेला का क्या इतिहास है तो चलो शुरु  करते है 

उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है ?हरेला का पर्व का इतिहास ?क्या है हरेला ?

उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है ?

हरेला पर्व कैसे मनाया जाता है ?

इसे उत्तराखंड में हरियाली का त्यौहार भी कहा जाता है इसे उत्तराखंड में बड़े धूम धाम से मनाते है इसे होली ,दिवाली ,क्रिसमस की तरह नहीं मनाते है बल्कि इसे हरियाली के रूप में मनाया जाता, इसको मानाने का मुख्य उद्देश्य हरियाली के साथ साथ सुख समर्धि और पर्यावरण को सरक्षित करना होता है , इसमें उत्तराखंड के कुमाऊनी लोग  हरेला से 9 दिन पहले कई अनाज बोते है जैसे गेहू ,जौ ,मक्का भट्ट ,सरसो आदि के बीज  बोते है और कुछ दिन बाद ही वो बीज पोधों  में अंकुरति हो जाते है और इन्हीं पौधो  को हरेला कहा जाता है फिर परिवार की एक बुजुर्ग महिला सबको हरेला लगाती है और हरेला को पूजने का भी रिवाज़ कुछ अलग होता है सबसे पहले ये पैरो में लगाया जाता है ,फिर घुटने में ,फिर कंधे में ,फिर सर में पूजा जाता है और सर से हरेला गिरे न इसलिए लोग इसे कानो में लगते है.

उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है ?हरेला का पर्व का इतिहास ?क्या है हरेला ?

जब परिवार की बुजुर्ग महिला सर पे हरेला लगाती है तो वो अपना आशीवार्द देती है जिसकी कुछ पंकितिया कुछ इस प्रकार से है

हरेला पर्व की poem 

जी गये जागी रये धरती जस आगव,

आकाश जस चाकव है जये,

सूर्य जस तराण,

स्याव जस बुद्धि हो,

दुब जस फलिये,

सील पीसी भात खाये,

जाठि  टेकि झाड़ जाये।

 

इस पंक्ति का अर्थ ये है की तुझे  हरियाली मिले अर्थात  तुझे अनाज की कोई कमी नहीं हो तेरे पास सब चीज रहे इसके बाद जागरूक रहो ,पृथ्वी के सामान धैर्य वान रहो ,आकाश के सामान उतरवान बनो ,सूर्य के सामान तेज चमको ,सियार की तरह बुद्धि हो क्युकी सियार यहाँ इसलिए कहा है सियार को लोमड़ी कहते है और लोमड़ी की तरह तुम्हारी तेज चालाक  बुद्धि हो,  दुब की तरह फैलो क्युकी दूब एक ऐसी घास होती है  जो तेज गति  के साथ फैलती है और इतनी दीर्घ आयु बनो की जब तुम्हारा अंतिम समय निकट आये तो भी तुम अपने दांतो से खाने को खाएं  क्युकी जब हम बुड्ढे हो जाते तो हमारे दाँत  नहीं रहते है इसलिए तुम्हरी आयु इतनी दीर्घ रहे की तुम अपने अंतिम समय तक खाने को दांतों से खाये और शौच जाने के लिए तुम्हें अपने लाठी का प्रयोग करना पड़े। यानि की तुम 100 साल तक जियो तो अब आप समझ सकते है की हरेला में बुजुर्गो से कितना आशीवार्द मिलता है तभी इसे आशीवार्द का त्यौहार भी कहा जाता है वैसे तो हरेला 3  बार मनाया जाता है चैत्र, श्रवण ,आश्विन। चैत्र का अर्थ मार्च से अप्रैल और श्रवण जुलाई ,अगस्त और आश्विन सितम्बर ,अक्टूबर में होता है लेकिन श्रवण मास के हरेला को विशेष माना जाता है क्युकी ऐसा माना  जाता है की भगवान्  शिव को सावन का महीना बहुत पसंद होता है और  इस टाइम सावन का महीना चल रहा होता है और इसलिए भगवान शिव के सावन के महीने  में हरेला को सबसे ज्यादा  महत्व दिया जाता है अब आप  सोच रहे होंगे की इस पर्व को इतना क्यू महत्व दिया जाता है की लोग कई सालो से इसको मना  रहे है और इस पर्व का क्या इतिहास है आइये  जानते है। 

उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है ?हरेला का पर्व का इतिहास ?क्या है हरेला ?

हरेला पर्व की स्टोरी

आज से 1 00 0 0  पहले उत्तराखंड के कुमाऊँ के कुछ इलाको में खेत काफी सुख चुके थे और वहा जुलाई से कोई बारिश भी नहीं हो रही थी और लोगो की काफी फसलों का नुकशान भी हुआ था, तब कुमाऊँ के लोग  ने भगवन शिव की पूजा की और कठिन तपस्या करि, उनके ऊपर जल चढ़ाया और उनसे विनती करी ,कहा हमारे खेतो में पानी की बौछार कर दे जिस से हमारे फसल अच्छे से उगे और हमारा जीवन  यापन हो सके तब भगवान शिव ने उनकी पूजा से प्रसन्न होके वहा पे बारिश हो जाती और इस तरह लोगो की इतनी मेहनत  का इतना dedication देखते  हुए आज तक इस पर्व को मनाया जाता है और भगवन शिव के इसी आशीर्वाद से  हर सावन के महीने में बारिश होती है  और सावन के महीने में ही हरियाली का जनम का जनम हुआ और भगवन शिव के इसी आशीर्वाद को लोग हरेला का नाम देते है क्युकी  हरेला का अर्थ ही हरियाली होता और बारिश होने से वो सूखी फसलों को तरोताजा कर देती है और चारो तरह हरियाली हो जाती है इसलिए इस पर्व को काफी धूमधाम  के साथ मनाया जाता है

उत्तराखंड में हरेला पर्व क्यों मनाया जाता है ?हरेला का पर्व का इतिहास ?क्या है हरेला ?

और कहा जाता है की जिसका हरेला जितना ज्यादा  लम्बा और उच्चा होता  है उसे कृषि में उठना ही फायदा होता है और मजे की बात तो ये है दोस्तों भारत के जितने त्यौहार है सबकी डेट बदलती रहती है बस एक हरेला पर्व की डेट अक्सर  सामान रहती है  कभी कभार डेट ऊपर नीचे हो जाती है लेकिन maximum time  एक ही होती है जैसे आज 17  जुलाई है और आने वाले कई सालो तक 16,17  जुलाई को ही हरेला मनाया जायेगा।

तो दोस्तों उम्मीद करते है आपको ये हरेला पर्व की कहानी और इससे रिलेटेड बातें अच्छी लगी होगी और सम्पूर्ण  जानकारी प्राप्त हुई होगी ,आगे फिर मिलेगें एक और नयी जानकारी के साथ।

 

 

 

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